Love at Thames

शशांक अल-जजीरा न्यूज़ चैनल देख रहा था, टीवी पर न्यूज़ चल रहा था एक खबर आ रही थी -मिडिल ईस्ट में टेरर अटैक, इजिप्ट में १०० लोगों की मौत. एक आत्मघाती दस्ता ने विस्फोट किया – टीवी पर जो दृश्य आ रहा था वो अति ह्रदय विदारक था. खून से लोग लथपथ थे, लोगों का शरीर चीथड़ों में बट कर चारो तरफ फैला हुआ था. चारो तरफ – लाशें, मांस, खून, अफरातफरी और अपनों को ढूंढते हुए बिलखते लोग. किसी का सर धड़ से अलग हो गया था, किसी का पैर उड़ गया था, किसी का हाथ, किसी की दृष्टि जाती रही थी, सबसे महत्वपूर्ण बात थी – अनेक लोगों को दुनिया वीरान हो गयी थी, प्रेमी ने प्रेमिका खोया था, प्रेमिका ने प्रेमी, माँ- बाप ने अपने घर के चरागों को खोया था, मासूम बच्चों ने अपना दूध खोया था, दुनिया ने मानवता खोयी थी, अतिवादियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी –मासूमों की, निह्थों की जान ले कर.

शशांक न जाने क्यों बेचैन हो रहा था – इस समाचार को देख कर !.  उसका तो कोई नहीं था काहिरा में, फिर बेचैनी क्यों ? मृतकों का नाम टीवी स्क्रीन पर फ़्लैश हो रहा था. अनेक नामों में एक नाम मारिया भी था. शशांक का दिल बहुत तेजी से धड़का – उसे कुछ अनहोनी की आशंका थी. फिर खुद को मुतमईन किया – मारिया तो लन्दन में रहती है, वो नहीं हो सकती है.

वो यादों के पुराने पन्नों को पलटने लगा. आज से करीब ४ साल पुरानी बात है. जब वो लन्दन में था और मारिया उससे पहली बार मिली थी – पहली मुलाक़ात में अपनी छाप छोड़ दी थी, पाश्चात्य कपड़ों में लिपटी हुई,ऊँची हील के साथ, नीली आँखों वाली स्त्री, हाँ – वो कोई युवती नहीं थी, न वो प्रौढ़ा थी. सेन्ट्रल लन्दन के ऑफिस में मारिया फोटो कॉपी कर रही थी, शशांक को प्रिंटआउट लेना था, वहीं उनकी पहली मुलाकात हुई थी.

थोड़ा सकुचाते हुए, सकपकाते हुए उसने कहा था,” आई ऍम शशांक फ्रॉम इंडिया.”

“आई ऍम मारिया फ्रॉम लन्दन”. पहली मुलाकात में बस इतनी सी बात हुई थी.

जब वो गेस्ट हाउस लौटा, ऑफिस के बाद, उसे लगा वो अभी भी मारिया के अरोमा में लिपटा हुआ है. उसने शावर लिया पर वो खुशबू दूर नहीं हो पायी.

अगले दिन उसे ऑफिस जाने की जल्दी थी, वैसे अंग्रेज टाइम के बड़े पाबन्द होते हैं और उनकी मीटिंग सुबह के ९.०० बजे से ही शुरू हो जाती है.  वो ओएस्टर कार्ड पहले से खरीद रखा था, जो लन्दन की मेट्रो और बसेज में चलती है. लन्दन की मेट्रो को टूयब कहते हैं. सुबह तैयार होने के बाद ब्रेकफास्ट किया और एक अच्छा परफ्यूम भी लगा लिया उसके बाद तेज क़दमों से भागते हुए स्ट्रेटफोर्ड स्टेशन की और चल दिया. रास्ते में बर्फ़बारी होने लगी. उसे याद आया – किसी ने सच ही कहा था – लन्दन का मौसम और वहाँ की लड़कियों का कोई भरोसा नहीं होता है. कभी भी बारिश हो सकती है और लडकियां कभी भी साथ छोड़ सकती हैं.

रास्ते में कई सारे हिन्दुस्तानी खाने के रेस्तुरेंट्स मिले, चर्च दिखे और आखिरी में  स्ट्रेटफोर्ड स्टेशन. जैसे वो प्लेटफार्म पर पहुंचा, ट्रेन निकल गयी थी और अगली ट्रेन १ मिनट बाद ही आने वाली थी. यह देखकर उसे थोड़ी तसल्ली हुई.

प्लेटफार्म पर बहुत भीड़ थी, लोग किसी तरह ट्रेन में इंटर कर रहे थे और अपने बदन को इस तरह सिकोड़ रहे थे कि ट्रेन का डोर लॉक हो जाये.

जब शशांक ऑफिस पंहुचा तो ९.३० हो चुका था और मीटिंग ख़त्म होने वाली थी. वो एक स्टैंड अप कॉल थी, जो की रोज होती थी और जिसमें सबकी प्रतिभागिता आवश्यक होती है. शशांक के अंग्रेज मेनेजर ने कहा ,” Mr. Shashank, you’ll have to come little early from next day onwards.”

“I am new to this place hence faced difficulites in locating this. I am sure, I’ll be on time from tomorrow onwards.” He was little applogetic while saying this.

जब टीम मीटिंग रूम से निकल रही थी, तो उसने देखा कि मारिया भी एक टीम मेम्बर से बात करती हुई निकल रही है. मारिया को दूसरे से बात करते देख , न जाने क्यों, उसे बुरा लग रहा था. मानव मन भी अजीब होता है, अकारण ही अधिकार जताने लगता है और इर्ष्यालू हो जाता है. मारिया ने अपनी मखमली आवाज में शशांक को हेल्लो कहा. इस हेल्लो वर्ड में ‘लो’ पर काफी जोर था. शशांक ने भी “हेल्लो” का जवाब “हेल्लो” से ही दिया.

कई बार कुछ चीजें पूर्व-निर्धारित होती हैं, शायद ईश्वर अपनी योजना के अनुसार करता, मानव सिर्फ कठपुतली मात्र होता है. शशांक की सीट, मारिया के बगल में ही थी. ज्यादातर स्त्रियाँ चीजों को काफी करीने से सुव्यस्थित रखती हैं. मारिया की वर्किंग डेस्क को देखकर भी ऐसा ही लग रहा था. एक दम साफ़-सुथरी. उस डेस्क पर एक रेड कलर का पेन पड़ा था, एक नोटबुक और कुछ प्रिंटआउटस. ये सब कुछ अपने नियत स्थान पर रखे थे, और एक नील नदी का पोर्ट्रेट टंगा था, जिसके नीचे लिखा था –““लाइफ विदआउट लव इज लाइक ए ट्री विदआउट ब्लोसमस ऑर फ्रूट.”

लन्दन में लोग लंच जल्दी करते हैं – करीब १२ से १.३० के बीच में. मारिया ने १२.३० पर शशांक से कहा,”लंच टाइम”. दोनों ने कोट चढ़ाये और बाहर निकल गए – लंच के लिए. बाहर जानलेवा ठंढ थी, सर्द हवा के थपेड़े, बदन को तार-तार कर रहे थे,दांत भी आपस में टकराकर बज रहे थे. दोनों छोटे-मोटे गलियों से रेंगते हुए वहाँ पहुँच जहाँ खाने के कई स्टाल लगे थे, लोग अपने कार्ट के साथ तैयार थे. कहीं इटालियन फ़ूड, तो कहीं इंडियन फ़ूड. दोनों ने एक-दुसरे को आँखों ही आँखों में कुछ कहा और पास्ता का आनंद उठाने लगे. जब पेमेंट की बात आयी तो मारिया ने शशांक को रोक दिया और कहा,” यू आर माय गेस्ट.”

“हाउ वाज द फ़ूड सर?”, इटालियन फ़ूड वाले ने पूछा.

“इट वाज एक्सट्रीमली डिलीशियस.” इतना कहकर दोनों तेज क़दमों से ऑफिस की ओर भागे.

ऑफिस आकर दोनों अपने-अपने काम में मशगुल हो गए और शाम के चार बजे, शशांक ने पूछा,”कॉफ़ी”.

“ऑफिस वाली या बाहर वाली”,

“बाहर की, स्टार बक्स की कॉफ़ी लेंगे.”

“तो चलें.”

“हाँ, चलो”.

फ्रेश्ली ब्रू हो रही कॉफ़ी की खुशबू बहुत ही रेफ्रेशिंग थी.

कॉफ़ी का सिप लेते हुए शशांक ने कहा,” स्टार बक्स के लोगो को ध्यान से देखा है क्या तुम ने मारिया?”.

“नहीं!, इसमें इतना ख़ास क्या है?”

“ध्यान दो, ये दो चोटियों वाली मरमेड है और सर पे एक क्राउन है.”

“तुम सही कह रहे हो शशांक!, तुम्हारी ऑब्जरवेशन पॉवर बहुत अच्छी है.”

“तुम ने भी दो चोटियाँ बनायी हुई है, इसी मरमेड की तरह, कहाँ की मरमेड हैं आप?”

“मैं और मरमेड.” अपनी आँखें फैलाती हुई मारिया बोली. अपनी बातों को आगे बढ़ाते हुए बोली,” मैं सच में हूँ, दंतकथाओं की जलपरी नहीं हूँ, जलपरियाँ कपड़े नहीं पहनती हैं क्योंकि वो पानी में रहती है और मैं वस्त्रों से, अपने आभूषण से लिपटी हूँ. मुझे लम्बे बालों की आवश्यकता नहीं हैं, अपने मान को ढकने के लिए, अगर तुम जलपरी ही कहना चाहते तो मुझे नील नदी की बेटी मानो”

नोट ***सांस्कृतिक तौर पर जलपरियां बिना कपडों के बताई गई है पर विवाद से बचने के लिए यह प्रयास किया जाता है की जलपरियों के लम्बे बाल उनके स्तनों को ढक लें।****

“तुम तो लन्दन से हो, फिर नील नदी की बेटी कैसे?”

“मेरे पिता काहिरा से थे, फिर हुई न मैं नील नदी की बेटी.नील नदी मेरे लिए, सदैव से कौतूहल का विषय रहा है, इस महान नदी के गोद में, सभ्यता अनादि काल से पल्लवित पुष्पित होती रही है, आज भी पिरामिड की छाया नील नदी में देखी जा सकती है”.

अचानक शशांक की नजर अपनी कलाई घड़ी पर चली गयी, देखा सायं के ५ बज गए थे, “अब हमें चलना चाहिए.”

“तुम किधर जाओगे शशांक.”

“स्ट्रेटफोर्ड की और.”

“हमारी राहें जुदा हैं, आज के लिए लेते हम विदा हैं.”

“आप तो शायरी भी कर लेती हैं.”

बिना कुछ बोले  वो ट्रेन में बोर्ड कर गयी.

शशांक ट्रेन को तब तक देखता रहा, जब तक वो ट्रेन उसकी आँखों से ओझल नहीं हो गयी. ये आँखें भी अजीब होती हैं, कुछ भी नहीं कहती हैं, और सब कुछ कह देती है, इन आँखों को कैसे कहूँ कि

तुम खामोश रहो,

धडकनों को बातें करने दो.

दो जिस्मो की साँसों को पास आने दो.

इनको नभ के  तारों की तरह  मुस्कराने दो.

गर, तुम  न रहे खामोश !

तुम्हारी जग में चुगली हो जायेगी

मेरी चोरी पकड़ी जायेगी.

देर रात शशांक की आँखों में नींद नहीं थी, वो मारिया के साथ बिताये पलों के बारे में ही सोच रहा था. बोलने में कुछ उंच-नीच तो नहीं हो गयी, कुछ ज्यादा तो नहीं बोल दिया. इतना तो वो कभी नहीं सोचता था, यहाँ तक कि जब वो १६ साल का था. कुछ भी तो नहीं पता है उसे मारिया के बारे में, कौन है वो -मैरिड है, अनमैरिड है, या तलाकशुदा  है, उसके घर में कौन-कौन हैं? कल सब पूछ लूँगा, ये सोचते सोचते वो सो गया.

कई दिन बीत गए, और सप्ताहांत आ गया, कुछ भी ज्यादा बात नहीं हो पायी. बस ऑफिस के काम की बातें और कुछ नहीं. लन्दन में, शुक्रवार को लोग ऑफिस से जल्दी निकल जाते हैं, और आस-पास के  बार में  बैठकर शीशे की लम्बी-लम्बी ग्लासएज में बियर का आनंद उठाते हैं. शुक्रवार को सारे लोग ऑफिस से निकल गए थे, सिर्फ मारिया और शशांक ही काम कर रहे थे, एक इम्पोर्टेन्ट असाइनमेंट था, जिसे दोनों मिलकर पूरा कर रहे थे. जैसे ही असाइनमेंट पूरा हुआ, मारिया ने कहा,”चलें”. “कहाँ”, शशांक ने छूटते ही कहा.

“कहीं, भी, आज की शाम टेम्स नदी के आस-पास का लुत्फ़ उठाते हैं.”

“ठीक हैं,” शशांक ने कहा.

‘जल्दी करो, अब कोई मेल या कोई स्टेटस रिपोर्ट मत भेजने लगना.’, मारिया ने कहा.

शशांक की एक बुरी आदत थी, जब उसे ऑफिस से निकलना होता था तब ही उसे कोई न कोई और काम याद आ जाता और फिर वो देर कर देता. मारिया आज देर नहीं करना चाहती थी. इसलिए उसने ऐसा शशांक से कहा.

दोनों ऑफिस से निकल लिए, बाहर वही सर्द हवाएं, इतनी तेज की, शशांक के मुंह से आवाज नहीं निकल पा रही थी. फील लाइक टेम्परेचर -५,६ रहा होगा. थोड़ी देर में टावर ब्रिज के पास पहुँच  गए. टावर ब्रिज टेम्स ब्रिज पर स्थित हैं. ये आइकोनिक ब्रिज आज ही टूरिस्टस के लिए आकर्षण का केंद्र है.

बत्तियों के जलने के कारण, लन्दन टावर, उसके सस्पेंसन, और भी खुबसूरत लग रहे थे. कई उत्साही लोग फोटोग्राफी कर रहे थे, कई प्रेमी कपल्स सेल्फी ले रहे थे, कुछ लोग विडियो रिकॉर्डिंग कर रहते थे.  इतने एक २० साल का युवा दौड़ कर आया, वो ऑरेंज जैकेट में था, ब्रिज से छलांग लगा दिया, टेम्स नदी में, पेट के बल नदी में गिरा, शायद उसे बहुत चोट आयी थी, शायद, उसका शरीर ठण्ड से जकड़ सा गया था, वो तैरने की असफल कोशिश कर रहा था, पर नदी की तेज बहाव, उसे दूर लेते जा रही थी, अचानक न जाने उसमें कहाँ से ताकत आ गयी, वो जी-जान लगाकर तैरने लगा और किनारे पर आकर बदहवास गिर गया, तब तक लाइफ बोट में रेस्क्यू टीम भी आ गयी थी, रेस्क्यू टीम ने उस मरणासन्न युवक को तुरंत हॉस्पिटल में भर्ती करवाया.

इस घटना के कारण दोनों की शाम ख़राब हो गयी थी, दोनों एक-दूसरे से अगले दिन मिलने का वादा कर विदा ले लिए.

फ़ोन की घंटियाँ लगातार बजते जा रही थी, शशांक परेशान हो रहा था, इतनी सुबह-सुबह कौन नींद ख़राब कर रहा  है. मारिया का फ़ोन था.

“हाँ,बोलो”, शशांक ने कहा.

“दरवाजा खोलो”.

“क्या,क्या,इतनी सुबह, तुम यहाँ !”

“हाँ, एक दिन मैं तुम्हारे साथ बिताऊंगी, देखती हूँ, जीवन की सरिता किधर ले जाती है!”

दरवाजा खोलने से पहले शशांक ने खिड़की का पर्दा हटाकर बाहर की ओर देखा, बर्फपात हो रही थी, मौसम बहुत ही ख़राब था.

दरवाजा खुलते ही मारिया कूदकर रजाई के अन्दर चली गयी और बोली अब ठंढ से निजात मिलेगी. शशांक भी रजाई में खुद को लपेट लिया. इस प्रक्रिया में मारिया की उंगलियाँ उसके हांथों को छू गयी.

“थोड़ी देर बाद ये हाथों की ये ठिठुरन कम हो जायेगी.”, शशांक ने कहा.

मारिया कुछ नहीं बोली और अपनी आँखें बंद कर सो गयी.

शशांक इधर-उधर थोडा खटर-पटर करने लगा. थोड़ी देर बाद हलके हांथों से मारिया को थपथपाया. मारिया सोयी कहाँ थी! धीरे धीरे वो अपनी नीली आँखें खोली, सामने शशांक खड़ा है चाय और ब्रेड के साथ.

“ऐसी चाय तो मैने पहले कभी नहीं पी.”, मारिया ने कहा.

“ये देसी चाय है, मैडम!”

“मैं तो आपकी मुरीद हो गयी.”

“शुक्रिया.”

“इसकी रेसिपी मैं तुमसे सीखूंगी.”

“क्यों, नहीं, ये हमारे देसी चाय है ” फिर शशांक ने कहा.

चाय पीने के बाद, काफी देर तक दोनों चुप-चाप बैठे रहे. कप और प्लेट को मारिया ने टेबल पर रख दिया.

दोनों मौसम के साफ़ होने की प्रतीक्षा कर रहे थे. दिन के १२ बज चुके थे.

शशांक को न जाने क्या सूझी. उसने मारिया के चेहरे को अपने दोनों हथेलियों से पकड़ लिया और उसके चहरे एक दम करीब आ गया. मारिया समझ नहीं पायी – शशांक ये क्या कर रहा है?

“मेरी आँखों में देखो मारिया, मेरी आँखों की पुतलियों में देखो, कुछ दिखाई दे रहा है तुम्हे.”

“नहीं, नहीं, कुछ नहीं दिखाई दे रहा है, तुम्हारी आँखों में”

“अरे देखो तो सही, मेरी आँखों में तुम्हारी तस्वीर छुपी है.” अपनी बातों को आगे बढ़ाते हुए शशांक ने शायराना अंदाज में कहा – “क्या मेरी आँखों में छुपी नहीं तेरी तस्वीर है, ये खुदा को भी नसीब नहीं, ये मेरी तक़दीर है!!”

टीवी चल रहा था. टीवी पर टेम्स नदी वाली खबर आ रही थी. उस लड़के का इंटरव्यू चल रहा था. रिपोर्टर जानना चाह रहे थे, वो नदी में में क्यों कूदा?

उसका जवाब सामान्य लोगों की सोच से परे था. वो कह रहा था,” मैं अपनी प्रेमिका को लव यू बोलना चाहता था, इसलिए टेम्स में कूद गया?”

कैसी पागलपंथी की बातें कर रहे हैं आप, कूदना और लव यू बोलना – इन दोनों में आपस में, क्या सम्बन्ध हो सकता है?” एक रिपोर्टर ने उस लड़के से कहा

“भय और कुछ भी नहीं, मैं तो अपना भय दूर करना चाहता था. अगर मैं मृत्यु के भय से पार पा लूँगा तो लव यू बोलने में, सारी झिझक दूर चली जायेगी.” अपने चहरे पर बहादुरों की हंसी बिखेरते हुए उसने कहा.

बाहर का मौसम ठीक हो गया था. दोनों निकल गए बाहर घूमने.

एक बार फिर पहुँच गए टेम्स नदी के आस-पास.

“क्या तुम ठंढ को  भगाना चाहते हो शशांक?”

“क्यों, नहीं.”

“तुम्हारे लिए मैं एक कैप्सूल लायी हूँ, जिसे खाकर तुम्हारे शरीर में बहुत गर्मी आ जायेगी.”

“कैसी, बातें कर रही हो? मुझे नहीं पता ऐसी कोई कैप्सूल होती है और होगी भी तो मैं नहीं खाऊंगा”

“तुम्हे खाने को कौन कह रहा है!!”

“उस कैप्सूल में बैठना होगा, उसमें यात्रा करनी होगी.”

“ऐसा कौन सा कैप्सूल होता है!”

इस बार मारिया ने कुछ नहीं कहा, उसके हाथ में क्यूपिड कैप्सूल पैकेज का टिकट उसके हाथ में रख दिया.

क्यूपिड कैप्सूल पैकेज लन्दन आई का एक स्पेशल पैकेज है जो कपल्स के लिए होता है.

दोनों की कैप्सूल में प्रायोरिटी बोर्डिंग हो गयी. शशांक ने होस्ट को कहा,” इतनी खातिरदारी के लिए धन्यवाद, और अभी आप जा सकते हैं, कैप्सूल में आपकी आवश्यकता नहीं होगी.”

“यू एन्जॉय योर जर्नी”, कहकर होस्ट चला गया.

लन्दन आई की ३० मिनट की यात्रा शुरू हो गयी.

पौड में चोकलेट्स और शैम्पेन भी थे.

“इनटोक्सीकेटेड होने के लिए शैम्पेन की जरूरत नहीं है, प्यार की नशा ही अपने मूल रूप में ही अच्छा है.” शंशंक ने मारिया से कहा.

मारिया ने कुछ जवाब नहीं दिया, दोनों पौड से लन्दन को निहारने लगे. कैप्सूल के ग्लास बहार सबकुछ दिखायी दे रहा था. बादलों से भरा आसमान, अपनी ही चाल से बहती टेम्स नदी, पार्लियामेंट, वेस्टमिन्स्टर और बहुत कुछ.

“नील नदी की बेटी हो तुम और टेम्स का गौरव बन गयी हो. तुम्हारी नीली आँखों को देख कर लगता है, तुम सर्वत्र व्याप्त हो, जैसे नीला आसमान. मैं तुम्हे आज से माया कहूँगा, – मेरी माया. मैं तुम्हारी माया से नहीं निकल पाऊंगा मारिया. चलो छोडो, कुछ अपने बारे में और बताओ.”

“क्या करोगे तुम मेरे बारे में जानकर, तुमने तो कह ही दिया कि तुम माया हो, और माया को आज तक कौन समझ पाया है, शशांक. प्यार में कौतूहल बना रहे तो बेहतर. मुझे एक पहेली समझो और तुम उसे सुलझाने की कोशिश करते रहो.”

दोनों ने एक बार फिर से एक-दुसरे की आँखों में झाँका, प्यार को ढूँढा और चलते बने, अपनी-अपनी राहों पर, कल मिलने का वादा कर.

सोमवार का दिन था. ऑफिस का ख़तम करने के बाद एक-बार फिर चल दिए टेम्स नदी के आस-पास.

साथ चलते रहे, एक-दुसरे से बात करते रहे.

“प्यार के बारे में क्या सोचते हो, शशांक”, मारिया ने पूछा

“कल रात खलील जिब्रान की एक कहानी पढ़ी थी”, वही सुनाना चाहूँगा.

एक स्त्री ने एक पुरुष से कहा, “मैं तुम्हें प्यार करती हूँ।”
पुरुष ने कहा, “तुम्हारा प्यार पाना मेरा सौभाग्य है।”
स्त्री ने कहा, “क्या तुम मुझे प्यार नहीं करते?”
पुरुष ने टकटकी लगाकर उसे देखा, कहा कुछ नहीं।
तब स्त्री जोर से चीखी, “मुझे नफरत है तुमसे।”
पुरुष ने कहा, “तुम्हारी नफरत पाना भी मेरा सौभाग्य है।”

(खलील जिब्रान)

मैं तो एक सपना हूँ शशांक. आज हूँ – कल नहीं रहूँगी, मुझसे ज्यादा नेह मत लगाओ.” अपनी आँखों से ढरकते अश्कों को छुपाते हुए माया ने कहा.

“सपनों में यकीन करता हूँ, क्योंकि उसमें अनंत खुशियाँ होती हैं.”, शशांक ने कहा.

“सपने अगर बिखर गए तो !!!”

शशांक ने इसका जवाब नहीं दिया. एक बार फिर दोनों ने विदा लिया – मिलने का वादा करते हुए.

 

शशांक के ऑनसाईट असाइनमेंट का टाइम ख़तम हो रहा था, उसे अब इंडिया लौटना था.

वो हीथ्रो एअरपोर्ट पर था. माया उसे छोड़ने आयी थी.

जाते-जाते शशांक ने कहा था,” मेरे प्रेम की कोई सीमा नहीं नहीं है जब कहोगी, आ जाऊंगा, जब कहोगी चला जाऊँगा, बस इसी टेम्स नदी की तरह – तरल. मैं प्रेम में भी निस्पृहता तलाश करता हूँ.”

“क्या मैं कहूंगी –  तो, तुम नहीं जाओगे, तुम्हे मैं नहीं रोकूंगी.”

एक बार फिर शशांक माया के बहुत करीब आ गया, माया को लगा अब शशांक उसकी आँखों को चूम लेगा पर शशांक ने कहा, “तुम्हारी ये आँखें व्हाइट नील और ब्लू नील है”.

माया ने विदा करते हुए कहा,” ya’aburnee

 

शशांक अपनी यादों से बाहर निकला और माया को फ़ोन लगाया, फ़ोन लग नहीं रहा था. उसने सोचा, शायद मारिया अपने रिलेटिव्स से मिलने इजिप्ट गयी और आतंकी हमले का शिकार हो गयी हो. वो फ़ोन ट्राई करता रहा, इस बार फ़ोन लगा गया और इस मारिया की आवाज थी और उसने एक बार फिर कहा ,” ya’aburnee”. फ़ोन से आवाज आनी बंद हो गयी शशांक हेलो हेलो कर रहा था. डॉक्टर ने फ़ोन उठाया और बोला,” मारिया कई सालों से कैंसर से पीड़ित थी और उसने अभी आखिरी सांस ले ली.  .

शशांक रोने लगा और रोते हुए ya’aburnee गूगल किया  और चल पड़ा लन्दन– माया का अंतिम संस्कार करने के लिए.

जब वो लन्दन पंहुचा तो देखा माया का अनंत विस्तार सीमित हो चुका है, उसकी हथेलियाँ खुली हैं, जिस पर मेहंदी से श लिखा है.

 

 

 

Image from : http://www.surreyartists.co.uk/dorking-art-group/moonlit-stroll-river-thames-walk-night-london-art-gallery.htm

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