ये प्यार !

1

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“तुम बहाना ढूंढते हो मिलने के लिए,

कभी तो मिलो यूं ही.”

जैसे ही नयना ने अपनी ये पंक्तियाँ ख़तम की, उसकी सहेली क्या बात है, क्या बात है, करने लगी.

वो दोनों सहेलियां पार्क में बैठी थी और आते-जाते लोगों की पद-चाप सुन रही थीं.

“अभी कोई पुरुष गुजरा ना यहाँ से:, नयना ने चहकते हुए कहा.

“हाँ, पर तुम्हे कैसे पता चला”, रीमा ने कहा.

“ख़त का मजमून भाप लेते हैं लिफाफा देखकर, और हम उनको पहचान लेते हैं उनके क़दमों की आहट सुनकर”, नयना ने मुस्कुराते हुए कहा.

“वो तुम्हे घूर-घूर कर देख रहा था.”, रीमा ने नयना को छेड़ते हुआ.

“चलो कोई तो हुआ मुझ पर भी मेहरबान, शायद मेरी भी तन्हाई दूर हो जाए, तुम लोगों की तरह मेरा भी कोई बॉय फ्रेंड बन जाय. मेरे जीवन के कोरे कागज़ पर कोई अपना नाम लिख जाय,और ये नयना खुद को उसके नाम कर जाय.”

“तुम्हे प्यार-व्यार की क्या जरूरत! तुम तो एचीवर हो.”

“अचीवर का दिल नहीं होता है क्या, उसका दिल धड़कता नहीं है क्या?” नयना नाराजगी जताते हुए बोली.

“मोहतरमा, आप तो बुरा मान गयीं.”

“मोटी, मैं बहुत बुरा मान गयी हूँ, अब मैं अपने दिल की बात तुम से ही बताउंगी.”, दोनों खिलखिलाकर हंस पड़े.

शाम हो रही थी, इसलिए दोनों होस्टल की ओर चल दिए.रीमा ने नयना को उसके रूम पर छोड़ा और फिर अपने रूम पर चली गयी.

नयना का ध्यान बार-बार रीमा की उस बात पर चला जा रहा था कि वो लड़का तुम्हे घूर रहा था. वो इन ख्यालों में खो गयी – क्या वो सचुमच मुझे इंटरेस्टेड है? क्या मेरा भी स्टेटस सिंगल से कमिटेड हो पायेगा? क्या मेरा भी कोई बॉय फ्रेंड होगा.. इसी उधेड़-बुन में पड़ी रही, उसे लगा कि उसके शरीर में में एक मीठी सी सरसराहट हो रही है, वो इसको अनुभव कर सो गयी.

2)

अगली शाम :

शाम को रीमा और नयना उसी पार्क में बैठे थे. आज फिर वो लड़का गुजरा तो रीमा ने कहा ,” तुम्हे वो आज भी घूर रहा था, लगता है उसको तुम पसंद आ गयी हो.”

“आपकी जैसी मेरी किस्मत कहाँ ! मेरी महारानी. अच्छा ये बता, कैसा है वो? “

“दुबला पतला है, आँखों पर बहुत ही मोटे ग्लास का चश्मा पहनता है और धीरे-धीरे चलता है. रंग सावंला है और उसकी हाइट तुम्हारे बराबर ही होगी.”

“फिर तो परफेक्ट मैच है मेरे लिए !”

एक बार पुनः सूर्य देवता विराम लेना चाहते थे और रीमा और नयना हॉस्टल जाना चाहते थे. जैसे ही रीमा और नयना हॉस्टल पहुचने वाले थे कि रीमा का बॉय फ्रेंड मिल गया.

कैसी हो नयना?

“तुम कैसे है रवि? मैं तो अपनी सुने जीवन में रंगों को सुनने की कोशिश कर रही हूँ. तुम्हे और रीमा को एक साथ सुनती हूँ तो बहुत अच्छा लगता है.”

“इसमें कौन सी बड़ी बात है ! तुम हमें रोज सुन लिया करो. हमारे साथ चलोगी क्या ? हम लोग मूवी देखने जा रहे हैं.”

“फिर कभी चलूंगी, आज थोड़ी तबियत ठीक नहीं हैं.”

रवि और रीमा दोनों एक-दूसरे की अंगुलियाँ थामे चल पड़े. उनकी हंसी देर तक नयना के दिमाग में कौंधती रही और वो – अपनी तन्हाई की लिबास को लपेटे देर रात जागती रही.

तन और मन के संताप को दूर करने के लिए वो देर तक शावर के नीचे नहाती रही. जब उसे लगा अब वो थोड़ी सी बेचैनी दूर हो रही है तो उसने खुद को तोलिये में लपेटा और एक कमरे में बंद कर लिया और तेज स्वरों में गाने लगी.

कोई तो करे मुझसे प्यार,

कोई तो करे मुझसे इजहार.

मेरा भी दिल है बेकरार,

कोई तो करे मुझसे प्यार.

थोड़ा-सा इनकार, थोड़ा सा मनुहार,

मान भी जाउंगी करके के थोड़ा सा बेकरार.

आज हो जाए – इंकार, इकरार, तकरार और प्यार.

आ भी जाओ, आ भी जाओ, मेरे हमदम, मेरे यार.

मुझे कर लो अंगीकार,

मुझे कर लो स्वीकार,

है खुली बांहे, बुलाती तुझको प्यार की राहें.

इस तन्हाई में ढूंढती तुझको मेरी आहें.

दूर करो, दूर करो,

मेरी बेचैनी, मेरी तड़प, ओ मेरे प्यार!

कोई तो करे मुझसे प्यार,

कोई तो करे मुझसे इजहार,

गाती रही, नाचती रही और फिर थक कर बिस्तर पर निढाल हो गयी.

सुबह जब वो देर से उठी तो उसे लगा कि पूरे बदन में एक अकड़न सी है. उसने खुद को सहलाया और फिर शांत बैठ गयी.

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3)

अगली शाम :

नयना को अपनी तन्हाई कचोट रही थी और वो चुपचाप अपने कमरे में बैठी रही. न जान किन ख्यालों में खोई रही, अचानक उसे लगा कि कोई उसके कमरे की ओर आ रहा है, वो जोर से चिल्लाई कौन है? इतने में किसी ने उसे पीछे से जकड लिया.ये स्पर्श उसे जाना-पहचाना लग रहा था और उसने बिना एक पल गंवाए कहा ,” मोटी तुम, कभी नहीं सुधरोगी!”. फिर दोनों सहेलियां जोर-जोर से हंसने लगी.

रीमा ने दोनों हाथों से नयना को बेड पर बिठा दिया. दोनों सहेलियां काफी देर तक एक-दूसरे के हाथों में हाथ डाले बातें करती रहीं.

रीमा ने कहा,” नैनू, लगता है, आज तुमने कुछ खाया नहीं है.”

“मन नहीं था रीमू!”

“तुम्हारे लिए, तुम्हारी फेवरिट वेजिटेबल मैगी बनाती हूँ और साथ में फ्लेवर ऑफ़ धौलाधार भी होगी.”

“ये फ्लेवर ऑफ़ धौलाधार क्या है?”

“कांगड़ा टी का दूसरा नाम.”

“ये आपके हाथ कैसे लगी?”

“अरे नैनू, मैं और रवि धरमशाला गए थे तो कांगड़ा भी चले गए थे वहीं से लेकर आयी थी, काफी दिनों से मेरे रूम पर पडी थी तो सोचा हम दोनों मिलकर इस चाय का आनंद उठाएंगे.”

नयना को लगा कि किसी ने उसके ताजे जख्मों पर नश्तर चला दिया. चेहरे पर अपने भावों को छुपाती हुई बोली,”देर कैसी, मेरे पेट में चूहे धमाचौकड़ी मचा रहे रहे हैं. जल्दी बना और और खिला. और हाँ, टमाटर, शिमला मिर्च, मटर और हरी मिर्च डालना मत भूलना.”

“तू तो खुद ही तीखी मिर्ची है रे!, नैनू.”

रीमा थोड़ी देर तक किचन में खटर-पटर करती रही और एक प्लेट में मैगी और दो बड़े-बड़े कप में चाय लेकर आ गयी.

पहला कौर मैं तुम्हे खिलाऊँगी! रीमा ने कहा.

“बहुत ख्याल रखा जा रहा है, क्या बात है रे रीमू!”

“कुछ भी नहीं, आप मुस्कुराएँ, बस, इतनी-सी चाह है.”

दोनों मिलकर मैगी को चट कर गए और चाय को भी धीरे-धीरे ख़त्म कर डाले.

इस चाय की बात ही कुछ और है. ऐसी विशिस्ट खुशबू वाली चाय मैंने पहली बार पी है. इसकी खुशबू मेरे जेहन में वैसे ही कौंधती रहेगी, जैसे एक लडकी अपना पहला प्यार ताउम्र याद रखती है.”

रीमा ने देखा कि नयना के चेहरे की रंगत थोड़ी स्याह हो गयी है. उसे लगा कि नयना उससे कुछ न कुछ छुपा रही है, उसके मन कुछ न कुछ न पाने की कसक है.

चुप्पी को तोड़ते हुए रीमा ने कहा, “ चलो पार्क चलते हैं.”

रीमा ने नयना का हाथ थाम लिया और दोनों धीर-धीरे चल पड़े पार्क की ओर. पार्क में उसी बेंच पर दोनों बैठ गए. इतने में सामने से रवि आता दिखा और रवि के साथ वो लड़का भी जो नयना को रोज घूर कर चला जाता था.

जब वो दोनों रीमा और नयना के पास पहुच गए तो बोले

“और क्या गुफ्तगू हो रही है, अगर कोई गर्लियापा नहीं हो रहा हो तो हम भी आप के साथ बैठ कर थोडा कपलियापा कर ले. आप दो और हम भी दो.”

“निसंकोच और निसंदेह बैठ जाइए जनाब.” रीमा ने मुस्कुराते हुए कहा.

रीमा के बगल में रवि बैठ गया और नयना के बगल में वो पिछले दो दिनों से घूरने वाला लड़का.

रवि ने सबका इंट्रो करवाया.. ये है रीमा – मेरी फ्रेंड, ये हैं नयना – रीमा की फ्रेंड और मेरी फ्रेंड और ये हैं हमारे बचपन के फ्रेंड सोम व् ये बहुत अच्छा गिटार बजाते हैं.

सामने से एक चायवाला अपने हाथों में गरम चाय की केतली और गले में ढेर सारे कप लटकाए चाय –चाय चिल्लाते हुए जा रहा था. उसकी चाय-चाय बोलने की अदा कुछ निराली थी जिससे लोग बरबस आकर्षित हो रहे थे और उससे चाय खरीद रहे थे.

“भैया, चाय पिलाओगे”, रवि ने पूछा.

“क्यों नहीं बाबूजी!, हम तो आपकी सेवा के लिए ही दौड़ लगा रहे है, कितनी कप लेंगे आप?” मसाला चाय लेंगे या नार्मल, मीठी लेंगे या फीकी, प्लास्टिक की कप में लेंगे या पेपर कप में.

“यहाँ कोई आपको मधुमेह बीमारी वाला दिखाई देता है क्या?”

“अरे नहीं सर, आजकल फिटनेस का जमाना है, बहुत लोग चाय में चीनी नहीं लेते हैं, हमे तो सबका ख्याल रखना पड़ता है. मैम को फिगर की चिंता होती है, और सर को फिजिक की. फिर वो हंसने लगा.”

सब ने चाय पीने पर सहमति जतायी.

“२ मसाले वाली और २ नॉर्मल चाय दो, ध्यान रहे चाय पेपर कप में ही होनी चाहिए.

चाय वाले ने सब को चाय दी और चाय के साथ ४ सुगर के सैशे और २ मसाला के सैशे.

“कितने पैसे हुए भैया!” रवि ने पूछा

“६० रूपये”

जाते-जाते वो कहा, “भैया, चाय के कप को डस्टबिन में ही डालना. स्वच्छ भारत का ख्याल हमें ही रखना है.”

रवि सोचने लगा, जाते-जाते ये चाय वाले ने कितनी बड़ी बात कह दी. रवि की नजर हट नहीं रही थी उस चाय वाले से, वो सोच रहा था विचारों में भव्यता पैसों से नहीं, बल्कि उदार सोच से आती है. उसके फटे जूते, उसके फटे कपड़े से उसकी सोच प्रभावित नहीं हो रही है.

“अरे कहाँ खो गए”, रीमा ने रवि को कहा.

“कहीं नहीं”.

सोम और नयना आपस में इस तरह मशगूल हो गए जैसे वो दोनों एक-दूसरे को वर्षो से जानते हों.

दोनों को आपस में बातें करते देख रवि और रीमा ने आपस में आँखों ही आँखों में एक-दूसरे को कुछ कहा और वहाँ से खिसक लिए.

सोम और नयना दोनों काफी देर तक बात करते रहे, उन्हें अहसास नहीं हुआ कि काफी देर हो चुकी है, फुटबॉल और क्रिकेट खेलने वाले बच्चे घर जा चुके हैं.

अचानक नयना ने कहा,” मेरे हॉस्टल में एंट्री बंद हो जायेगी अगर अब नहीं चले तो. मोटी, तू मुझे हॉस्टल छोड़ दे“

“रीमा और रवि तो चले गए हैं. यहाँ पर बस अब – तुम और मैं.”

“अच्छा, मिलने दो मोटी को, उसकी खबर लेती हूँ, वो मुझे छोड़कर चली गयी.”

“जाने भी दो नयना, मैं हूँ न आपके साथ, हम दोनों साथ-साथ चलते हैं.”

सोम ने नयना का हाथ थाम लिया और वो दोनों धीरे-धीरे चलने लगे.

जब सोम नयना को होस्टल छोड़ कर जाने लगा तो नयना को लगा वो कह दे, मत जाओ, यहीं रुक जाओ, कितने दिनों बाद मिले हो तुम, पर वो नारी सुलभ झिझक के कारण कुछ कह नहीं पायी और उसे गले लगा कर विदा कर दी.

आज नयना बहुत खुश थी. उसे लग रहा था उसके सुनसान जीवन में अब कोई तो संगीतकार आ गया है जो अपने सुर-लय ताल से उसे जीवन में आनंद का तराना छेड़ेगा.

आज एक बार फिर नयना को नींद नहीं आ रही थी पर आज कोई उद्वेग नहीं था, था तो बस पूरे तन पर बस एक मीठी-सी सिहरन.

4)

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आगे के कुछ दिन:

शुरुआत के कुछ दिनों तक रवि, रीमा, नयना और सोम साथ-साथ पार्क में मिलते थे, बाद में रवि और रीमा किसी और पार्क में जाने लगे और नयना और सोम किसी और जगह

नयना और सोम अब हर रोज मिलते थे, और दोनों खूब खुश रहते थे.

एक दिन जब दोनों झाड़ियों के बीच बैठे थे , तब नयना ने कहा ,” कोई देख लेगा तो अनर्थ हो जाएगा! मैं ऐसी जगह पर तुम से मिलना नहीं चाहती हूँ.” प्यार की चाह पर दुनियादारी का डर हावी नहीं हो पा रहा था, वो मिलते ही रहते थे एक-दूसरे से, दुनिया की नजरो से, खुद को बचाकर, खुद को पकड़े जाने की जोखिम में डाल कर..

एक दिन सोम ने रवि से कहा,” यार, हम बाहर मिलते हैं तो हमें डर लगता है कहीं हमारे प्यार को दुनिया की नजर न लग जाए.”

“तू हर दिन २ घंटे शाम को मेरा रूम यूज़ कर लिया कर, अपनी इजहारे- ए -मोहब्बत के लिए.”

“थैंक यू, यार, तूने मुझे दुनिया की काली नज़रों से बचा लिया.”

अब नयना और सोम दोनों बेफिक्र मिलने लगे और उनका प्यार परवान चढ़ने लगा. कोई देख लेगा इस बात का भय उनको अब नहीं था.

एक रात जब नयना, सोम की यादों में खोयी थी तो वो सोच रही थी, वो अंधी है तो क्या हुआ? उसे इतना ज्यादा प्यार करने वाला बॉय फ्रेंड मिला है. उसके मिल जाने से हर मुश्किल आसान हो गयी है, पहले कहीं भी जाने में कितनी दिक्कत होती थी, सड़क पार करने में, मेट्रो में सफ़र करने में, कोई मदद करता था मन में एक झीझक भी रहती थी, न जाने वो किस भाव से हाथ पकड़ रहा है क्योंकि वो देख तो नहीं सकती थी. आज वो झिझक नहीं हैं, क्योंकि सोम के साथ रहने उसे अपनी हर मंजिल पास दिखती है और हर समस्या आसान. ऐसा नहीं था कि सोम सब कुछ देख सकता था, हाँ, उसे भी थोड़ा-बहुत ही दिखाई देता था पर यह भी वरदान था दोनों लिए.

एक शाम सोम गिटार ले कर आया, सोम ने एक धुन को अपनी गिटार के तार पर सजाया तो नयना ने अपनी खनकती आवाज से उस धुन पर सोम का साथ निभाया.

उस गीत के बोल कुछ इस तरह थे –

कल तक, हाँ कल तक – चल नहीं पाती थी,

आज पंख लगा के उड़ जाती हूँ.

उड़ जाती हूँ,

उड़ जाती हूँ,

आज पंख लगा के उड़ जाती हूँ,

सोम के दिल को भाती हूँ.

पंख लगाके उड़ जाती हूँ.

सपनों में, ख्यालों में, उसे ही पाती हूँ.

मैं उसकी पाती हूँ,

पंख लगा के उड़ जाती हूँ,

जब ये गीत ख़त्म हुआ तो सोम ने कहा,” तुम सुर हो तो मैं ताल हूँ, तुम जिस्म हो तो मैं जान हूँ, तुम चोली हो तो दामन हूँ, तुम हो, तो मैं हूँ, वरना मैं कुछ भी नहीं हूँ. “ नयना ने कुछ भी नहीं कहा , बस उसके काँधे पर सर रख कर देर तक सुबकती रही और उसकी तेज होती साँसों को महसूस करती रही.फिर अचानक उसे जोर से अपनी बांहों में जकड ली, जैसे अब उसे कभी नहीं छोड़ेगी और उसे जाने नहीं देगी. अपने का ठोर का शोर, उसके ललाट पर, उसके कपोलों पर चस्पा करती हुई उसके वक्ष स्थल तक आ गयी और अचानक रुक गयी फिर बोली,” तुम मुझे छोड़ोगे तो नहीं न? तुम्हारे बिना मेरी जिन्दगी वीरान हो जायेगी.”

“जिस्म के बिना रूह क्या करेगी?” सोम ने बहुत छोटा-सा जवाब दिया.

“मेरे होठों के निशान तुम्हारे ललाट पर होंगे, जाने से पहले उसे मिटा दो.” नयना ने कहा.

तपती साँसों की हरारत (warmth) से पिघल जाती है,

पाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती है

बन के सीमाब (mercury) हर इक ज़र्फ़ (बर्तन) में ढल जाती है

ज़ीस्त (जीवन) के आहनी (लोहे) साँचे में भी ढलना है तुझे

उठ मेरी जान!! मेरे साथ ही चलना है तुझे” (कैफ़ी आज़मी)

मैं इसे नहीं मिटाऊंगा, मैं इसी में लिपटा हुआ तुम्हारी निकहत-फ़शाँ (fragrance) के साथ जाऊँगा. सोम ने एक साँस में कह डाला और निकल पड़ा.

नीचे उतरते ही वो वाशरूम गया, चेहरा धोया और निकल लिया.

5)

एक दिन जब रीमा अपनी सहेली नीरा के साथ, नयना के यहाँ पहुँची तो देखी कि वो मेकअप करवा रही है.

“परफ्यूम लगा लेती, मेकअप की क्या जरूरत थी?” नीरा ने कहा.

“सोम आने वाला है इसलिए.”

“का पर करूँ सिंगार पिया मोर आंधर… सुना है तुमने.” नीरा ने कहा.

“ये क्या बोल रही हो?”, रीमा ने टोकते हुए कहा.

“आज-कल सोम किसी और लडकी के साथ भी चक्कर चला रहा है, उसे मैंने कॉलेज में किसी और के साथ भी देखा है”, इसलिए मैं नयना को आगाह करना चाह रही हूँ.

यह सुनकर नयना सोचने लगी, वैसे तो ये बात सच होगी नहीं पर इसकी परीक्षा कैसे लूं, पता कैसे करू कि ये सच है या झूठ.

रीमा ने कहा ,”तू मन छोटा मत कर, नीरा मजाक कर रही थी.”

पर अब शक का बीज मन में डल गया था तो नयना मन ही मन बेचैन हो रही थी पर उसने मन की बेचैनी को छुपाते हुए कहा,”मुझे रवि के यहाँ छोड़ दे, वही सोम आने वाला है.”

नयना को रीमा और सोमा ने रवि के यहाँ छोड़ दिया और वो दोनों चले गए. नयना चुपचाप सोम का इन्तजार करने लगी. वो धीमे क़दमों के साथ आया और नयना का हाथ अपने हांथों में लेकर बैठ गया.

काफी देर तक दोनों एक-दूसरे से कुछ नहीं बोले, चुप-चाप बैठे रहे.

“कुछ तो बोलो”, सोम ने कहा.

“आज मन नहीं है.”

“इतनी उदासी का कारण क्या है?”

“ देकर दर्द, पूछते हो मर्ज, क्या करूँ मैं अर्ज.”

“आप करें अर्ज, मैं नहीं इतना खुदगर्ज.”

नयना चुपचाप सोम के और करीब आ गयी और दोनों एक-दूसरे के काफी करीब आते चले गए. इन्ही अन्तरंग पलों के बीच नयना ने सोम का iphone उसके पॉकेट से निकाल कर छुपा दिया. थोड़ी देर बाद जब दोनों सहज हुए तो बस-इधर की बातें करने लगे.

“हमारे इस सम्बन्ध का भविष्य क्या है?”, नयना ने पूछा.

“अभी तो हम एक-दूसरे को जान ही रहे हैं. समय के साथ चलते रहेंगे, जो होगा देखा जाएगा.”

“तुम्हारी लाइफ में मेरे अलावा कोई और तो नहीं है!”

“कैसी बातें करती हो? तुमने ऐसा सोंचा भी कैसे, मैं तो बस – सोचा नहीं अच्छा बुरा, देखा सुना कुछ भी नहीं, मांगा ख़ुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं (बशीर बद्)”.

“खैर छोडो इन बातों को, काफी देर हो गयी है, रवि भी आने वाला होगा, तुम जाओ, मैं रीमा के साथ अपने हॉस्टल चली जाउंगी.” इधर नयना सोच रही थी कि वो (सोम) जल्दी जाए जिससे वो रीमा को बुला ले और उसके साथ मिलकर iphone पर सोम के मेसेजेज को पढ़ सके.

नयना ने फ़ोन कर रीमा को बुलाया और दोनों ऑटो में बैठकर नयना के हॉस्टल की ओर चल दिए.

जैसे ही वो दोनों कमरे में बैठे, नयना ने धड़कते दिल से,कांपते हांथों से, सोम का iphone अपने बैग से निकाला और SIRI को SMS पढने का कमांड दिया.

(SIRI is a software which can read your sms/email on your behalf) .

जैसे ही SIRI ने मेसेज पढ़ना खत्म किया, नयना के हाथों से फ़ोन गिर गया और वो जोर-जोर से रोने लगी. जो शक था, वो सच्चाई में तब्दील हो गया था. उसे आज एक बार फिर अपने अंधे होने पर दुःख हो रहा था.

रीमा ने उसको ढाढस बंधाया, दोनों सहेलियां काफी देर तक रोती रहीं और रीमा नयना को समझाती भी रही. नयना के आंसू पोछते हुए, नहीं रोने की कसम खिलाकर, रीमा अपने हॉस्टल की ओर निकल पडी.

कुछ दिन बीत गए, लोग नयना को समझाते थे, भूल जाओ, पर नयना अपने जीवन में प्यार की कमी को बड़ी सिद्दत से महसूस करती थी. वो प्यार करना चाहती थी और उसे एक बॉय फ्रेंड भी मिल गया, जो समझदार भी था, शादी करने को भी तैयार था पर उसके अन्धेंपन को वो अच्छी तरह से नहीं समझ पाता था, शायद इसका कारण था कि वो अँधा नहीं था, पर वो सच्चा था, धोखेबाज नहीं था, और वो उस प्यार का त्याग नहीं करना चाहती थी और फ़ोन में अपनी ये बात रिकॉर्ड करती हैं –

प्रेम की चाह का त्याग – मैं नहीं कर सकती हूँ, क्योंकि यह मेरी आवश्यकता है, उसके प्यार में एक अंधे को समझने की जगह नहीं है, उसमे सहानुभूति ज्यादा है, पर उसका प्यार भी प्यार है, माना इस प्रेम में जिस्मानियत ज्यादा और रूहानियत कम है पर आज न कल ये प्रेम भी जिस्म से होते हुए रूह पर अपना कब्ज़ा कर लेगा.

आगे कहती है –

चराग जलता नहीं है मेरी आँखों में,

फिर भी शम्मा रोशनी करती है मेरे खवाबों में,

इश्क इम्तेहान लेती है, उमंगें कुलांचे भरती है मेरी बांहों में,

माना वो थोड़ा कम प्यार करता है, फिर भी

मैं खुश हूँ प्रेम कर, जल जाने में, उसकी बांहों में समाने में

इश्क की जुस्तजू में जल जाने में, मिट जाने में.

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