तलाश

मन के बियावान में,

उन वीथियों के सुनसान में,

तुम्हे ढूंढता हूँ कहीं …

पत्तों की सरसराहट के बीच,

मन की अकुलाहट के बीच

लगता है तुम मिलोगी वहीं..

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आसमान के उमड़ते-घुमड़ते बादलों में,

असंख्य लोगों की भीड़ में

तुम्हे ढूंढता हूँ कहीं …

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वो दूर बजते सितार में,

मंदिरों के घंटियों की आवाज में ..

मस्जिदों के अजान में ..

गुरु के सबद में …

तुम्हे ढूंढता हूँ कहीं …

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मन के किसी कोने में..

इस तन के होने और न होने में …..

इसी उहापोह में ….

तुम्हे ढूंढता हूँ कहीं …

इस सड़क के कोलाहल में..

इस भीड़ के अकेलेपन में ..

मिलोगी कहीं चुपचाप बैठी हुई.

दुनिया की नजरों से आँखें छुपाकर…

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