बंधन

१)

“किस से चैट कर रहे हैं?” निलेश के मित्र ने पूछा.

“ये कुछ ऑपरेशनअल एक्टिविटीज का डिस्कशन है”, निलेश अपना गुस्सा छुपाते हुए बोले. उन्हें अच्छा नहीं लगता था कि कोई आये और चुपचाप खड़ा होकर उनके लैपटॉप पर चल रही गतिविधियों को निहारे.

“अरे ये तो वही लडकी है! जिसे आप तेज-तर्रार बोल रहे थे.”

निलेश को ऐसा कुछ याद नहीं आ रहा था, ऐसा कुछ उसने कहा था. वो अपनी स्मृतियों को कुरेदने लगे. उन्हें याद आया – आज से करीब २ साल पहले जब वो टीटी खेल रहे थे. टीटी रूम में एक लडकी आयी थी और उनका ध्यान अनायास उसकी और चला गया था. उसमे दिखा था – एक अल्ल्हड़पन, एक चंचलता, एक चपलता, एक बेपरवाही और एक अनगढ़ आकर्षण. आँखों में एक ऐसी चमक जो किसी को भी बरबस आकर्षित कर ले. शायद, उसकी इन्ही बातों ने एकबारगी निलेश का ध्यान उसकी ओर आकर्षित कर लिया था और वो ख्यालों में खो गया था और सोचने लगा था. एक नदी जो कल-कल बह रही है. एक पहाड़ी से बेगवती गिर रही है. बहुत प्यास लगी है. अरे ये तो एक चश्मा है. इस चश्मे का शीतल पानी पीकर अपनी प्यास्र बुझा लूं. अचानक उसकी तन्द्रा भंग हुई और सब कुछ सामान्य, जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो. वो तवंगी बाला जा चुकी थी और निलेश अपने मित्रों के साथ टीटी खेलने में मग्न हो गये.

२)

निलेश ने निलोफर को सॉरी कहा चैट पर. कोई आ गया था, इसलिए मैं आपको रिस्पोंड नहीं कर रहा था.

“इट्स ओके”. निलोफर ने चैट विंडो में लिखा.

निलेश के दिल की धड़कनें अभी तक सामान्य नहीं हुई थी. पहली बार वो निलोफर से बात कर रहा था. निलोफर उससे मिलना चाह रही थी और उसे काम के बारे में बताना चाह रही थी.

“अपना सीट नंबर बताइये! मैं आपसे कुछ डिस्कस करना चाहती हूँ.”

निलेश को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करें? अपने दिल की धडकनों को सामान्य करते हुए टाल गया उससे मिलना..

बात आयी और गयी. दोनों कभी लिफ्ट में मिल जाते, कभी कैंटीन में पर कभी बात नहीं होती. जो भी बातें होती वो ऑफिस के फ़ोन पे, काम के सिलसिले में.

३)

निलेश ने अपने जिगरी दोस्त को फोन लगाया और कहा, ”आज निलोफर का फोन आया था और वो मुझसे मिलना चाहती थी. मैंने मना कर दिया. मुझे खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा है और तरस भी. कितना डरपोक और कमजोर आदमी हूँ मैं!”

“जिस रास्ते की कोई मंजील नहीं होती, उसपर चलना बेहतर नहीं होता है. तुमने अच्छा किया.”

दोनों दोस्तों ने दिल खोलकर बातें की. अपनी हसरतों को छुपाये हुए, सजाये हुए, निलेश ने अपनी बात ख़त्म की.

दिल ही दिल में निलेश ने खुद को कहा –

यूँ हसरतों के दाग़ मुहब्बत में धो लिये,

खुद दिल से दिल की बात कही और रो लिये.”

४)

उसे पता भी नहीं चला वो कब और कैसे धीरे-धीरे निलोफर की ओर की आकर्षित हो गया . इसे वो आकर्षण कहे, या प्यार, या कुछ और, उसे समझ नहीं आ रहा था. कम से कम ये पहली नजर का प्यार तो नहीं था. ये वो आग थी, जो धीरे-धीरे सुलगी थी, देर तक धधकने के लिए.

निलेश जब भी निलोफर को देखता तो उसे उसमें बसंती हवा की झलक दिखती थी. निलोफर को शायद यह ज्ञात नहीं था कि उसे कोई चोरी-चोरी देखता है, उसे पसंद करता है.

एक दिन न जाने क्या हुआ!! निलेश की चोरी करती आँखों को निलोफर ने पकड़ लिया. स्त्रियों की आँखें बहुत ही जल्द ही पहचान लेती है, यह उनकी स्वभावगत विशेषता होती है.

न जाने निलेश में क्या था? ये उसकी स्वभागत सरलता थी, या उसकी आँखों में एक पाकीजगी जो निलोफर को आकर्षित कर रही थी.

५)

नजरें बचाकर या नजरें दिखाकर – निलोफर अब निलेश को ढूँढने लगी थी. एक दिन निलेश अपने दोस्तों के साथ चाय पी रहा था. सामने से निलोफर अपने दोस्तों के साथ आ रही थी. निलोफर भी कॉफ़ी लेकर आ गयी अपने दोस्तों के साथ और निलेश के आस-पास ही बैठ गयी.

निलेश अपने दोस्तों से बात करता रहा, निलोफर अपने दोस्तों से बात करते रही. दोनों एक-दूसरे को देखते भी रहें. दोनों के दोस्त अनजान थे – इस नयन मिलन से.

चाय और कॉफ़ी ख़त्म हुई, दोनों अपने-अपने दोस्तों के साथ चल दिए – अपनी-अपनी राहों पर.

६)

कई दिनों से निलेश काफी उद्धिग्न था. उसे समझ नहीं आ रहा था – ऐसा क्यों हो रहा है? बेचैनी को दूर करने के लिए वो कभी किताबे पढता, कभी टीवी देखता और कभी दोस्तों से बातें करता. उसकी ये बेचैनी दूर नहीं हो रही थी.

देर रात वो ब्राउज़िंग कर रहा था. अचानक एक इनट्रेसटिंग आर्टिकल पर नजर पडी. “Infedility इन मेन !!”. वो पढ़ रहा था – एक रिसर्च के अनुसार जब पुरुष में मेल हारमोंस कम होने लगते हैं तो उनमे स्वभागत परिवर्तन होने लगते हैं. इसके कारण उनका ध्यान विवाहेतर संबंधों की ओर जाने लगता है.

वो मन ही मन हसने लगा – ये रिसर्च में कुछ भी छाप देते हैं. थोड़ी देर के लिए वो अपनी बेचैनी भूल गया था. अपने लैपटॉप को स्लीप मोड में डाला और अँधेरे के गोद में खो गया. वो करवटें बदलता रहा, उसे नींद नहीं आ रही थी, वो अब सुबह होने की प्रतीक्षा कर रहा था. अँधेरा उसे सुलाना चाह रही थी और मन सोना नहीं चाह रहा था, दोनों एक दूसरे पर उछल-उछल कर प्रहार कर रहे थे. अंततः जीत मन की हुई और सुबह के उजाले के साथ, निलेश बिस्तर छोड़ दिया. सूरज की किरणे खिड़की से उसके कमरे में धमा-चौकड़ी मचा रही थीं और वो शायद उन गुलाबी किरणों में किसी को ढूंढ रहा था. चिड़िया फुदक रही थी और चहचहा रही है, वो उसमें भी किसी को ढूंढ रहा था.

नित्य क्रिया कर्म से निवृत होकर वो जल्दी-जल्दी शेव किया और एक हाथ में सैंडविच और एक हाथ में लैपटॉप लेकर ऑफिस की ओर भागा. शायद सुबह-सुबह कस्टमर से मीटिंग थी.

7)

निलोफर अपनी पुरानी यादों में खोयी थी. वो निलेश को ही याद कर रही थी. वो अपने ब्लोग्स को खंगाल रही थी अचानक उसकी नजर एक फोटो पर पडी, जिसमें वो निलेश के साथ आत्मीयता के साथ खड़ी थी. जिसके कैप्शन में लिखा था – बेस्ट फोटो विथ निलेश काइंड कर्टसी माथुर.

फिर वो सोचने लगी – ये निलेश तो भूतकाल की बात थी, वर्तमान काल वाला ही निलेश मिल जाता काश!

उसके कमरे की लाइट जल रही थी.

“काफी रात हो गयी है, सो जाओ बेटा.” निलोफर के डैड ने कहा.

“हाँ, पापा सोती हूँ.”

“तू एक दम अपनी मम्मी पर गयी हो.”

“हाँ, पापा, आप सच कहते हैं, सभी लोग यही कहते हैं और सच कहते हैं लेकिन हूँ मैं अपने पापा की बेटी.” वो बाहर निकलकर आ गयी. पापा ने दुलारवश उसके मस्तक को चूमा और सो जाने कहा.

८)

निलेश भागते हुए ऑफिस पंहुचा और दौड़ कर लिफ्ट का बटन दबा दिया. लिफ्ट रूकी और वो इंटर किया उसने देखा की लिफ्ट में निलोफर भी है. उसे देखते ही उसकी बेचैनी दूर हो गयी. अब उसे समझ आया – बेचैनी का कारण! निलोफर की एक झलक उसको इतनी खुशी देती है, इतनी शान्ति देती है अगर वो उसके जीवन में आ जायेगी तो कितना सुकून आ जायेगा.

अचानक उसकी नजर लिफ्ट में लगे आईने पर गयी. निलोफर आईने को देखकर अपने बालों को ठीक कर रही थी.

उसकी नजरें निलोफर से हट नहीं रही थी, उसने खुद को संभाला और अपनी नज़रों को उससे दूर किया.

अब वो अनुमान लगा रहा था – निलोफर की हाईट ५ फीट १ इंच से ज्यादा नहीं होगी फिर भी वो फ्लैट सैंडल पहनती है, शायद उसे अपनी हाईट से कोई शिकायत नहीं है. उसकी ऊँची नाक –आर्यों जैसी. पूर्ण भारतीय रंग – अर्थात सांवली सूरत, पान के पत्तों से भी पतले होठ. एक दम फ्लैट टम्मी – जैसी मॉडलों की होती है. अगर वो लम्बी होती तो शायद इंटरनेशनल मॉडल्स को भी मात देती. पाउट बनाती है तो और भी प्यारी लगती है. अपने लम्बे बालों को संवारते हुए वो निकल गयी तब उन्हें ध्यान आया कि उन्हें मीटिंग के लिए देर हो रही है और वो मीटिंग के लिए भागे.

९)

लंच के लिए निलेश लिफ्ट से जा रहे थे. निलोफर भी अपने दोस्त के साथ लंच के लिए जा रही थी. निलोफर ने अपने दोस्त को कहा,” तुम्हारे बाल बड़े हो गए, चिड़िया के घोसले की तरह, यू नीड हेयर कट.”

उसके दोस्त ने बस सर हिला दिया.

निलेश ने देखा कि उसके दोस्त के बाल तो बड़े- बड़े नहीं हैं, हाँ उसके(निलेश) बाल जरूर बिखरे-बिखरे हैं और चिड़िया के घोसले की तरह भी. वो इशारा समझ गए.

१०)

कुछ दिन बीत गए. एक-बार फिर कई दिनों से निलोफर दिखाई नहीं दे रही थी. एक सुबह जब वो चाय पीने पहुंचे तो देखा – निलोफर अकेले चाय पी रही है और उसके हाथों में मेहंदी रची है. वो भी चुपचाप चाय पीने लगे. निलोफर धीरे से उनके पास आयी और बोली,” तुम बंधन जोड़ न पाए.”

निलेश भावावेश में आकर निलोफर का हाथ पकड़ लिए, वो भी बैठ गयी. दोनों एक-दूसरे को निहार रहे थे , दोनों की आँखों से असूअन की धार विरल-अविरल बह रही थी. उन्हें आस-पास का, और वक्त का कोई पता नहीं था. जब दोनों ने आँखे उठायी तो देखा उनके चारो तरफ ऑफिस के लोग खड़े हैं. निलेश ने कहा,” मैं बंधन जोड़ नहीं पाया और चल दिए. निलोफर भी चल दी – उसकी हांथो में एक कागज़ का टुकड़ा निलेश ने दिया वो उसे पढ़ रही थी –

मन के बियावान में,

उन वीथियों के सुनसान में,

तुम्हे ढूंढता हूँ कहीं …

पत्तों की सरसराहट के बीच,

मन की अकुलाहट के बीच

लगता है तुम मिलोगी वहीं..

वो दूर बजते सितार में,

मंदिरों के घंटियों की आवाज में ..

मस्जिदों के अजान में ..

गुरु के सबद में …

तुम्हे ढूंढता हूँ कहीं …

मन के किसी कोने में..

इस तन के होने और न होने में …..

इसी उहापोह में ….

तुम्हे ढूंढता हूँ कहीं …

इस सड़क के कोलाहल में..

इस भीड़ के अकेलेपन में ..

मिलोगी कहीं चुपचाप बैठी हुई.

दुनिया की नजरों से आँखें छुपाकर…

 

पाठको के लिए प्रश्न !

आखिर निलेश की क्या मजबूरी रही होगी????

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